भौतिकी विज्ञान क्या है

भौतिकी, प्रकृति विज्ञान की मुख्य शाखा है। कुछ विद्वानों के अनुसार भौतिकी ऊर्जा विषयक विज्ञान है और इसमें ऊर्जा के रूपांतरण तथा उसके द्रव्य संबन्धों की विवेचना की जाती है। इसमें प्राकृत जगत और उसकी आन्तरिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। जिसमें स्थान, काल, गति, द्रव्य, विद्युत, प्रकाश, ऊष्मा तथा ध्वनि आदि अनेक विषय सम्मिलित हैं। भौतिकी के सिद्धांत समूचे विज्ञान तरंग चक्र सिद्धांत क्या है और इसका क्या अर्थ है में मान्य हैं और विज्ञान की हर शाखा में लागू होते हैं। न्यूटन और आइंस्टाइन को आधुनिक भौतिकी शास्त्र का जनक माना जाता है।

भौतिकी में पदार्थ और ऊर्जा एक दूसरे के साथ परस्पर क्रिया और अंतरिक्ष के माध्यम से एक दूसरे को कैसे प्रभावित करते हैं, इसका अध्ययन किया जाता है। भौतिकी की दुनिया में हर खोज के साथ चीजें बदलती रहती हैं। जैसे-जैसे सिद्धांत आगे बढ़ते हैं और खोज की जाती है, न केवल उत्तर बल्कि पूरा प्रश्न बदल जाता है।

भौतिकी का मुख्य सिद्धांत

भौतिकी विज्ञान का मूल सिंद्धांत है ‘उर्जा संरक्षण का नियम’ (law of conservation of energy) है। ऊर्जा संरक्षण के लिए सबसे पहला सिद्धान्त साल 1841 में जूलियस रॉबर्ट मेयर (Julius Robert Mayer) ने दिया। उर्जा संरक्षण का नियम के मुताबिक किसी अयुक्त निकाय (isolated system) की कुल उर्जा समय के साथ नियत रहती है। आसान भाषा में इसका मतबल है कि उर्जा का न तो निर्माण किया जा सकता है न ही नष्ट किया जा सकता है। ऊर्जा को केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है।

K (1) + U (1) = K (2) +U (2)

K (1) = initial kinetic energy

U (1) = initial potential energy

K (2) = final kinetic energy

U (2) तरंग चक्र सिद्धांत क्या है और इसका क्या अर्थ है = final potential energy

‘उर्जा संरक्षण नियम’ का उदाहरण

‘उर्जा संरक्षण का नियम’ के मुताबिक गतिज उर्जा, स्थितिज उर्जा में बदल सकती है। विद्युत उर्जा, ऊष्मीय ऊर्जा में बदल सकती है। वहीं, यांत्रिक कार्य से उष्मा उत्पन्न हो सकती है। इसका सीधा-सा मतलब है कि ऊर्जा का केवल रूप परिवर्तित किया जा सकता है। किसी भी द्रव्यसमुदाय में ऊर्जा की मात्रा स्थिर होती है। इसे आंतरिक क्रियाओं द्वारा घटाया या बढ़ाया नहीं जा सकता।

भौतिकी और रसायन विज्ञान में संबंध

ऊर्जा के कई रूप हो सकते हैं और उनका एक रूप से दूसरे रूप में रूपांतरण किया जा सकता है, लेकिन ऊर्जा की मात्रा में परिवर्तन करना संभव नहीं हो सकता। ऊर्जा को लेकर आइंस्टीन ने भी एक प्रसिद्ध सिद्धांत दिया था, जिसे सापेक्षता के सिद्धांत के रूप में जाना जाता है। आइंस्टीन सापेक्षता समीकरण (E = mc2) के माध्यम से द्रव्यमान और ऊर्जा की तुल्यता का पता लगाया जा सकता है। इस समीकरण द्वारा द्रव्यमान को भी उर्जा में परिवर्ति किया जा सकता है। आइंस्टीन के इस समीकरण से द्रव्यमान संरक्षण और ऊर्जा संरक्षण दोनों सिद्धांतों का समन्वय हो जाता है। आइंस्टीन के इस इस सिद्धांत से भौतिकी और रसायन विज्ञान एक दूसरे से जुड़ जाते हैं।

भौतिकी विज्ञान का महत्व

विज्ञान जगत में भौतिकी का महत्त्व इसलिये भी अधिक है कि अभियांत्रिकी तथा शिल्पविज्ञान की जन्मदात्री होने के नाते यह इस युग के अखिल सामाजिक एवं आर्थिक विकास की मूल प्रेरक है। वर्षो पहले भौतिकी को दर्शन शास्त्र का अंग मानकर नैचुरल फिलॉसोफी या प्राकृतिक दर्शनशास्त्र के रूप में अध्ययन किया जाता था। साल 1870 के बाद में इसे भौतिकी विज्ञान (फिजिक्स) के रूप मे जाना जाने लगा।

भौतिकी विज्ञान की शाखाएं

भौतिकी विज्ञान तरंग चक्र सिद्धांत क्या है और इसका क्या अर्थ है में समय के साथ कई नई खोज और बदलाव होते गए। भौतिकी की आधुनिक परिभाषा में उर्जा और पदार्थ ओर उनके बीच के संबंधों का अध्यन किया जाता है। भौतिकी विज्ञान उन्नति और नई-नई खोज के बाद कई शाषाओं मे बंट गया। भौतिकी विज्ञान की प्रमुख शाखाएं निम्न हैं –

भौतिकी विज्ञान को मुख्य दो भागों में बांटा गया है –

  • चिरसम्मत भौतिकी (Classical Physics)
  • आधुनिक भौतिकी (Modern Physics)

चिरसम्मत भौतिकी (Classical Physics) – साल 1900 तक की भौतिकी विज्ञान को चिरसम्मत भौतिकी माना जाता था। इसकी प्रमुख उपशाखाएं निम्न हैं –

1. ऊष्मा एवं ऊष्मागतिकी (Heat and Thermodynamics) – इसमें ऊष्मा की प्रक्रति, संचरण और उसके कार्य में परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है।

2. ध्वनि एवं तरंग गति (Sound and Wave motion) – इस शाखा में तरंग गति एवं ध्वनि का उत्पादन और उनके संचरण का अध्ययन किया जाता है।

3. यान्त्रिकी (Mechanics) – यान्त्रिकी में प्रकाश की अपेक्षा निम्न चाल से चलने वाली वस्तुओं की गति और द्रव्य के गुणों का अध्ययन किया जाता है।

4. प्रकाशिकी (Optics) – इसमें प्रकाश व उसके उत्पादन, संचरण एवं संसूचन (detection) से होने वाली सभी घटनाओं का अध्ययन शामिल है।

5.विद्युत-चुम्बकत्व (Electromagnetism) – इसमें विद्युत व चुम्बकत्व एवं विद्युत-चुम्बकीय विकिरण का अध्ययन किया जाता है।

आधुनिक भौतिकी (Modern Physics) – आधुनिक भौतिकी में मुख्यत: 20वीं शताब्दी के बाद की खोज का अध्ययन किया जाता है। इसकी प्रमुख उपशाखाएं इस प्रकार हैं –

जानिए क्या हैं विद्युत चुंबकीय तरंगे?

क्या आप जानते हैं कि हमारी जिंदगी को विद्युत चुंबकीय तरंगे कैसे प्रभावित करती हैं? हम आपको तरंगों के कुछ प्रमुख नियम और कार्य बताएंगे.

electromagnetic waves

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 13 अक्टूबर 2014,
  • तरंग चक्र सिद्धांत क्या है और इसका क्या अर्थ है तरंग चक्र सिद्धांत क्या है और इसका क्या अर्थ है
  • (अपडेटेड 15 अक्टूबर 2014, 12:55 PM IST)

क्या आप जानते हैं कि हमारी जिंदगी को विद्युत चुंबकीय तरंगे कैसे प्रभावित करती हैं? यहां पर हम आपको तरंगों के कुछ प्रमुख नियम और कार्य बताएंगे.

तरंग (wave): तरंगों को मुख्यतः दो भागों में बांटा जा सकता है:
(i) यांत्रिक तरंग (mechanical wave)
(ii) अयांत्रिक तरंग (non-mechanical wave)

(i) यांत्रिक तरंग: वे तरंगें जो किसी पदार्थिक माध्यम (ठोस, द्रव, अथवा गैस) में संचरित होती है, यांत्रिक तरंगें कहलाती है. यांत्रिक तरंगों को मुख्यतः दो भागों में बांटा गया है:
(a) अनुदैधर्य तरंग (longitudinal wave): जब तरंग गति की दिशा माध्यम के कणों के कंपन करने की दिशा के समांतर होती है, तो ऐसी तरंग को अनुदैधर्य तरंग कहते है. ध्वनि अनुदैधर्य तरंग का उदाहरण है.
(b) अनुप्रस्थ तरंग (transverse wave): जब तरंग गति की दिशा माध्यम के कणों के कंपन्न करने की दिशा के लंबवत होती है, तो इस प्रकार की तरंगों को अनुप्रस्थ तरंग कहते हैं.

(ii) अयांत्रिक तरंग या विद्युत चुंबकीय तरंग (electromagnetic waves): वैसे तरंगें जिसके संचरण के लिए किसी भी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है, अथार्त तरंगे निर्वात में भी संचरित हो सकती हैं, जिन्हें विद्युत चुंबकीय या अयांत्रिक तरंग कहते हैं:
सभी विद्युत चुंबकीय तरंगें एक ही चाल से चलती हैं, जो प्रकाश की चाल के बराबर होती है.
सभी विद्युत चुंबकीय तरंगें फोटोन की बनी होती हैं.
विद्युत चुंबकीय तरंगों का तरंगदैधर्य परिसर 10^-14 मी. से लेकर 10^4मी. तक होता है.

विद्युत चुंबकीय तरंगों के गुण:
(a) यह उदासीन होती है.
(b) यह अनुप्रस्थ होती है.
(c) यह प्रकाश के वेग से गमन होती है.
(d) इसके पास ऊर्जा एवं संवेग होता है.
(e) इसकी अवधारणा मैक्सवेल के द्वारा प्रतिपादित की गई है.

प्रमुख विद्युत चुंबकीय तरंगें:-
(i): विद्युत चुंबकीय तरंगें: गामा-किरणें
खोजकर्ता: बैकुरल
तरंग दैधर्य परिसर: 10^-14m से 10^-10m तक
आवृत्ति परिसर Hz: 10^20 से 10^18 तक
उपयोग: इसकी वेधन क्षमता अत्यधिक होती है, इसका उपयोग नाभिकीय अभिक्रिया तथा कृत्रिम रेडियो धर्मिता में की जाती है.

(ii) विद्युत चुंबकीय तरंगें: एक्स किरणें
खोजकर्ता: रॉन्जन;
तरंग दैधर्य परिसर: 10^-10m से 10^-8m तक
आवृत्ति परिसर Hz: 10^18 तरंग चक्र सिद्धांत क्या है और इसका क्या अर्थ है से 10^16 तक
उपयोग: चिकित्सा एवं अौद्योगिक क्षेत्र में इसका उपयोग किया जाता है.

(iii) विद्युत चुंबकीय तरंगें: पराबैंगनी किरणें
खोजकर्ता: रिटर
तरंग दैधर्य; परिसर: 10^-8m से 10^-7m तक
आवृत्ति परिसर Hz: 10^16 से 10^14 तक
उपयोग: सिकाई करने, प्रकाश-वैद्युत प्रभाव को उतपन्न करने, बैक्टीरिया को नष्ट करने में किया जाता है.

(iv) विद्युत चुंबकीय तरंगें: दृश्य विकिरण
खोजकर्ता: न्यूटन
तरंग दैधर्य परिसर: 3.9 x 10^-7m से7.8 x10^-7m तक
आवृत्ति परिसर Hz:10^14 से 10^12 तक
उपयोग: इससे हमें वस्तुएं दिखलाई पड़ती हैं.

(v)विद्युत चुंबकीय तरंगें: अवरक्त विकिरण
खोजकर्ता: हरशैल
तरंग दैधर्य परिसर: 7.8 x 10^-7m से 10^-3m तक
आवृत्ति परिसर Hz: 10^12 से 10^10तक
उपयोग: ये किरणें उष्णीय विकिरण है, ये जिस वस्तु पर पड़ती है, उसका ताप बढ़ जाता है. इसका उपयोग कोहरे में फोटो ग्राफी करने एवं रोगियों की सेंकाई करने में किया जाता है.

(vi) विद्युत चुंबकीय तरंगें: लघु रेडियो तरंगें या हर्टज़ियन तरंगें
खोजकर्ता: हेनरिक हर्ट्ज़
तरंग दैधर्य परिसर: 10^-3m से 1m तक
आवृत्ति परिसर Hz: 10^10 से 10^8 तक
उपयोग: रेडियो, टेलीविजन और टेलीफोन में इसका उपयोग होता है.

(vii) विद्युत चुंबकीय तरंगें: दीर्घ रेडियो तरंगें;
खोजकर्ता: मारकोनी
तरंग दैधर्य परिसर: 1 m से 10^4 m तक
आवृत्ति परिसर Hz: 10^6 से 10^4 तक
उपयोग: रेडियो और टेलीविजन में उपयोग होता है.
नोट: 10^-3 m से 10^-2m की तरंगें सूक्ष्म तरंगें कहलाती हैं.

तरंग-गति (wave motion): किसी कारक द्वारा उत्पन्न विक्षोभ के आगे बढ़ाने की प्रक्रिया को तरंग-गति कहते हैं.

कंपन की कला (phase of vibration): आवर्त गति में कंपन करते हुए किसी कण की किसी क्षण पर स्थिति तथा गति की दिशा को जिस राशि द्वारा निरूपित किया जाता है. उससे उस क्षण पर उस के कंपन की कला कहते है.

निम्न तरंगें विद्युत चुंबकीय नहीं है:-
(i) कैथोड किरणें
(ii) कैनाल किरणें
(iii) α-किरणें
(iv) β- किरणें
(v) ध्वनि तरंगें
(vi) पराश्रव्य तरंगें

आयाम (amplitude): दोलन करने वाली वस्तु अपनी साम्य स्थिति की किसी भी ओर जितनी अधिक-से-अधिक दूरी तक जाती है, उस दूरी को दोलन का आयाम कहते हैं.

तरंगदैधर्य (wave-length): तरंग गति में समान कला में कंपन करने वाले दो क्रमागत कणों के बीच की दूरी को तरंगदैधर्य कहते हैं. इसे ग्रीक अक्षर λ(लैम्डा) से व्यक्त किया जाता है. अनुप्रस्थ तरंगों में दो पास-पास के श्रंगों अथवा गर्त्तो के बेच की दूरी तथा अनुदैधर्य तरंगों में क्रमागत दो सम्पीडनों या विरलनों के बीच की दूरी तरंगदैधर्य कहलाती है. सभी प्रकार की तरंगों में तरंग की चाल, तरंगदैधर्य एवं आवृत्ती के बीच निम्न संबंध होता है:-
तरंग-चाल = आवृत्ति x तरंगदैधर्य

भौतिकी विज्ञान क्या है

भौतिकी, प्रकृति विज्ञान की मुख्य शाखा है। कुछ विद्वानों के अनुसार भौतिकी ऊर्जा विषयक विज्ञान है और इसमें ऊर्जा के रूपांतरण तथा उसके द्रव्य संबन्धों की विवेचना की जाती है। इसमें प्राकृत जगत और उसकी आन्तरिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। जिसमें स्थान, काल, गति, द्रव्य, विद्युत, प्रकाश, ऊष्मा तथा ध्वनि आदि अनेक विषय सम्मिलित हैं। भौतिकी के सिद्धांत समूचे विज्ञान में मान्य हैं और विज्ञान की हर शाखा में लागू होते हैं। न्यूटन और आइंस्टाइन को आधुनिक भौतिकी शास्त्र का जनक माना जाता है।

भौतिकी में पदार्थ और ऊर्जा एक दूसरे के साथ परस्पर क्रिया और अंतरिक्ष के माध्यम से एक दूसरे को कैसे प्रभावित करते हैं, इसका अध्ययन किया जाता है। भौतिकी की दुनिया में हर खोज के साथ चीजें बदलती रहती हैं। जैसे-जैसे सिद्धांत आगे बढ़ते हैं और खोज की जाती है, न केवल उत्तर बल्कि पूरा प्रश्न बदल जाता है।

भौतिकी का मुख्य सिद्धांत

भौतिकी विज्ञान का मूल सिंद्धांत है ‘उर्जा संरक्षण का नियम’ (law of conservation of energy) है। ऊर्जा संरक्षण के लिए सबसे पहला सिद्धान्त साल 1841 में जूलियस रॉबर्ट मेयर (Julius Robert Mayer) ने दिया। उर्जा संरक्षण का नियम के मुताबिक किसी अयुक्त निकाय (isolated system) की कुल उर्जा समय के साथ नियत रहती है। आसान भाषा में इसका मतबल है कि उर्जा का न तो निर्माण किया जा सकता है न ही नष्ट किया जा सकता है। ऊर्जा को केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है।

K (1) + U (1) = K (2) +U (2)

K (1) = initial kinetic energy

U (1) = initial potential energy

K (2) = final kinetic energy

U (2) = final potential energy

‘उर्जा संरक्षण नियम’ का उदाहरण

‘उर्जा संरक्षण का नियम’ के मुताबिक गतिज उर्जा, स्थितिज उर्जा में बदल सकती है। विद्युत उर्जा, ऊष्मीय ऊर्जा में बदल सकती है। वहीं, यांत्रिक कार्य से उष्मा उत्पन्न हो सकती है। इसका सीधा-सा मतलब है कि ऊर्जा का केवल रूप परिवर्तित किया जा सकता है। किसी भी द्रव्यसमुदाय में ऊर्जा की मात्रा स्थिर होती है। इसे आंतरिक क्रियाओं द्वारा घटाया या बढ़ाया नहीं जा सकता।

भौतिकी और रसायन विज्ञान में संबंध

ऊर्जा के कई रूप हो सकते हैं और उनका एक रूप से दूसरे रूप में रूपांतरण किया जा सकता है, लेकिन ऊर्जा की मात्रा में परिवर्तन करना संभव नहीं हो सकता। ऊर्जा को लेकर आइंस्टीन ने भी एक प्रसिद्ध सिद्धांत दिया था, जिसे सापेक्षता के सिद्धांत के रूप में जाना जाता है। आइंस्टीन सापेक्षता समीकरण (E = mc2) के माध्यम से द्रव्यमान और ऊर्जा की तुल्यता का पता लगाया जा सकता है। इस समीकरण द्वारा द्रव्यमान को भी उर्जा में परिवर्ति किया जा सकता है। आइंस्टीन के इस समीकरण से द्रव्यमान संरक्षण और ऊर्जा संरक्षण दोनों सिद्धांतों का समन्वय हो जाता है। आइंस्टीन के इस इस सिद्धांत से भौतिकी और रसायन विज्ञान एक दूसरे से जुड़ जाते हैं।

भौतिकी विज्ञान का महत्व

विज्ञान जगत में भौतिकी का महत्त्व इसलिये भी अधिक है कि अभियांत्रिकी तरंग चक्र सिद्धांत क्या है और इसका क्या अर्थ है तथा शिल्पविज्ञान की जन्मदात्री होने के नाते यह इस युग के अखिल सामाजिक एवं आर्थिक विकास की मूल प्रेरक है। वर्षो पहले भौतिकी को दर्शन शास्त्र का अंग मानकर नैचुरल फिलॉसोफी या प्राकृतिक दर्शनशास्त्र तरंग चक्र सिद्धांत क्या है और इसका क्या अर्थ है के रूप में अध्ययन किया जाता था। साल 1870 के बाद में इसे भौतिकी विज्ञान (फिजिक्स) के रूप मे जाना जाने लगा।

भौतिकी विज्ञान की शाखाएं

भौतिकी विज्ञान में समय के साथ कई नई खोज तरंग चक्र सिद्धांत क्या है और इसका क्या अर्थ है और बदलाव होते गए। भौतिकी की आधुनिक परिभाषा में उर्जा और पदार्थ ओर उनके बीच के संबंधों का अध्यन किया जाता है। भौतिकी विज्ञान उन्नति और नई-नई खोज के बाद कई शाषाओं मे बंट गया। भौतिकी विज्ञान की प्रमुख शाखाएं निम्न हैं –

भौतिकी विज्ञान को मुख्य दो भागों में बांटा गया है –

  • चिरसम्मत भौतिकी (Classical Physics)
  • आधुनिक भौतिकी (Modern Physics)

चिरसम्मत भौतिकी (Classical Physics) – साल 1900 तक की भौतिकी विज्ञान को चिरसम्मत भौतिकी माना जाता था। इसकी प्रमुख उपशाखाएं निम्न हैं –

1. ऊष्मा एवं ऊष्मागतिकी (Heat and Thermodynamics) – इसमें ऊष्मा की प्रक्रति, संचरण और उसके कार्य में परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है।

2. ध्वनि एवं तरंग गति (Sound and Wave motion) – इस शाखा में तरंग गति एवं ध्वनि का उत्पादन और उनके संचरण का अध्ययन किया जाता है।

3. यान्त्रिकी (तरंग चक्र सिद्धांत क्या है और इसका क्या अर्थ है Mechanics) – यान्त्रिकी में प्रकाश की अपेक्षा निम्न चाल से चलने वाली वस्तुओं की गति और द्रव्य के गुणों का अध्ययन किया जाता है।

4. प्रकाशिकी (Optics) – इसमें प्रकाश व उसके उत्पादन, संचरण एवं संसूचन (detection) से होने वाली सभी घटनाओं का अध्ययन शामिल है।

5.विद्युत-चुम्बकत्व (Electromagnetism) – इसमें विद्युत व चुम्बकत्व एवं विद्युत-चुम्बकीय विकिरण का अध्ययन किया जाता है।

आधुनिक भौतिकी (Modern Physics) – आधुनिक भौतिकी में मुख्यत: 20वीं शताब्दी के बाद की खोज का अध्ययन किया जाता है। इसकी प्रमुख उपशाखाएं इस प्रकार हैं –

कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया क्या है, और इसका आध्यात्मिक महत्व?

सृष्टि के प्रारंभ से ही मनुष्य उसके रहस्य को जानने का प्रयत्न कर रहा है। वास्त्विकता मे वो सृष्टि को जानने की अपेक्षा वह उस पर अपना नियंत्रण करना चाहता है। उसका यही प्रयास उसे सृष्टि की सृजनात्मक शक्ति के विपरीत विध्वंसनात्मक शक्ति की और अग्रसर कर देता है।

कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया क्या है, और इसका आध्यात्मिक महत्व।

कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया क्या है?

ईश्वर की इस सृष्टि का रहस्य तो मनुष्य के अंतर मे ही छुपा हुआ है। इस सृष्टि का मूल तत्व तो मानव स्वयं ही है, क्योकि हमारा शरीर उन्ही पंच तत्वों का बना हुआ है, जिन पर यह सृष्टि आधारित है। सृष्टि पर नियंत्रण तभी संभव है जब हम स्वयं पर नियंत्रण कर लेते है।

जब मनुष्य अपनी आंतरिक शक्तियों को जाग्रत कर स्वयं को अपने पूर्ण नियंत्रण मे ले लेता है, तब यह सृष्टि स्वतः ही उसके अधीन होकर कार्य करने लगती है। आंतरिक शक्तियों तरंग चक्र सिद्धांत क्या है और इसका क्या अर्थ है का पूर्ण जाग्रत होना ही मनुष्य को पूर्ण सिद्ध की उपाधि प्रधान करता है।

हमारे शास्त्रों मे कुंडलनी जागरण और अनेको सिद्धियों का विस्तृत विवरण है। जिन्हे आध्यात्मिक चिंतन और योगा अभ्यास के द्वारा सहज ही प्राप्त किया जा सकता है। निरंतर ध्यान और योग साधना इतनी प्रभावी होती है, जिसके प्रभाव से कोई भी साधरण पुरुष दिव्यता को प्राप्त कर लेता है।

लगातार ध्यान व योग के अभ्यास से शांत चित्त और परमात्मा की प्राप्ति होती है। अधिकांश लोग कुंडलिनी के बारे में तो जानते हैं, लेकिन ये नहीं जानते हैं कि कुंडलिनी जागरण वास्तव में होता क्या है। कुंडलिनी जागरण सामान्य घटना नहीं होती। आत्म संयम और योग नियमों का पालन करते हुए निरंतर ध्यान करने से धीरे-धीरे कुंडलिनी जाग्रत होने लगती है।

कुंडलिनी एक दिव्य शक्ति है, जो एक कुंडली बनाकर बैठे हुए सर्प के सामान शरीर के सबसे नीचे के चक्र मूलाधार में स्थित होती है। जब तक यह इसी प्रकार नीचे रहती है तब तक व्यक्ति सांसारिक विषयों की ओर भागता रहता है।

परन्तु जब यह जाग्रत होने लगती है, तो ऐसा प्रतीत होने लगता है जैसे कोई सर्पिलाकार तरंग घूमती हुई ऊपर की और उठ रही है। यह एक बड़ा ही दिव्य अनुभव होता है। हमारे शरीर में सात चक्र होते हैं।

कुंडलिनी का एक छोर मूलाधार चक्र पर है और दूसरा छोर रीढ़ की हड्डी के चारों तरफ लिपटा हुआ जब यह ऊपर की ओर गति करता है, जिसका उद्देश्य सातवें चक्र सहस्रार तक पहुंचना होता है, लेकिन यदि व्यक्ति संयम और ध्यान छोड़ देता है तो यह छोर गति करता हुआ किसी भी चक्र पर रुक सकता है।

Kundlini Jagran Seven Chakra

कुंडलिनी जागरण के सात चक्र

यह गुदा और लिंग के बीच स्थित चार पंखुरियों वाला आधार चक्र है। आधार चक्र का ही एक दूसरा नाम मूलाधार चक्र भी है। यहाँ वीरता और आनन्द भाव का निवास होता है । 99.9% लोगों की चेतना इसी चक्र तक ही सिमित रहती है और वे इसी चक्र में ही रहकर मर जाते हैं। मनुष्य जब तक पशुवत है, तब तक वह इसी चक्र में जीता रहता है। जिसके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है उसकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है।

इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र जो लिंग मूल में स्थित होता है। यह छ: पंखुरियों वाला होता हैं। इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए यह जरूरी है कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त हो जाए तभी समस्त सिद्धियां आपका द्वार खटखटाएंगी।

नाभि के मूल में स्थित रक्त वर्ण का यह चक्र शरीर के अंतर्गत मणिपुर नामक तीसरा चक्र है, जो दस दल कमल पंखुरियों से युक्त है। जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है उसे काम करने की धुन-सी रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने पर तृष्णा, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह, आदि का नाश हो जाता है।

हृदय स्थल में स्थित स्वर्णिम वर्ण का द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से सुशोभित यह चक्र ही अनाहत चक्र है। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है, तो आप एक सृजनशील व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं। यदि यह सोता रहे तो वह व्यक्ति लिप्सा, कपट, तोड़ -फोड़, कुतर्क, चिंता , मोह, दम्भ, अविवेक अहंकार से भरा रहेगा। इसके जागरण होने पर यह सब दुर्गुण नष्ट हो जाते है।

Kundlini Jagran Seven Chakra

कण्ठ में विशुद्ध चक्र यह सरस्वती का स्थान है । यह सोलह पंखुरियों वाला है। यहां सोलह कलाएं और सोलह विभूतियां विद्यमान है। यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है, तो आप अति शक्तिशाली व्यक्ति होंगे। इसके जाग्रत होते ही सोलह कलाओं और सोलह विभूतियों का ज्ञान हो जाता है, तथा इसके प्रभाव से भूख, प्यास और मौसम के प्रभाव को भी रोका जा सकता है।

भूमध्य (दोनों आंखों के बीच भृकुटी में) में आज्ञा चक्र है, यहां हूं, फट, विषद, स्वधा, स्वहा, सप्त स्वर आदि का निवास है। यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से ये सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं और व्यक्ति एक सिद्धपुरुष बन जाता है।

सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो जाता है। ऐसे व्यक्ति को संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता और वह परमहंस के पद को प्राप्त कर लेता है, जो मोक्ष का द्वार है।

अंत मे निष्कर्ष

कुंडलिनी जागरण एक योगिक किय्रा है, जो निरंतर साधना और आध्यात्मिक ध्यान के द्वारा शरीर मे स्थित सातो चक्रो को जाग्रत करने की प्रकिर्या है । यह सधना तरंग चक्र सिद्धांत क्या है और इसका क्या अर्थ है किसी योग्य गुरु के नियंत्रण मे ही प्रारंभ करनी चाहिये । अगर इस किर्या मे साधक कोई भी असावधानी करता है, तो इसके विपरीत असर देखने को मिलते है ।

My Spiritual Diary

माई स्पिरिचुअल डायरी अपने प्रिय पाठकों को बहुमूल्य जानकारियाँ उपलब्ध कराने के लिये समर्पित है, हम अपने इस कार्य में उनके समर्थन और सुझाव की अपेक्षा करते है, ताकि हमारा यह प्रयास और बेहतर हो सके।

रेटिंग: 4.78
अधिकतम अंक: 5
न्यूनतम अंक: 1
मतदाताओं की संख्या: 193